सादा जीवन उच्च विचार-1

श्रील भक्ति रसामृत स्वामी द्वारा (चण्डीगड़)

भक्तों और संसारी जीवों की मानसिकता भिन्न होती है

आज नन्दमहाराज प्रभु के इच्छा के अनुसार हम सरल जीवन और उँचे विचार के बारे में कुछ कहना चाहते हैं। और विशेषकर के हम इस विषय को वृन्दावन के 6 गोस्वामियों से जोड़कर कुछ चर्चा आज हम करेंगे। यह सरल जीवन और उँचा विचार यह आजकल एक एसी बात है जो लोगों को बड़ा विचित्र लगता है, कि जीवन तो ऊँचा होना चाहिये किन्तु विचार सरल होने चाहिये। अभी आप कहते हो कि जीवन सरल होना चाहिए और विचार ऊँचे होने चाहिए। हाँ वास्तव में जिस रास्ते में कृष्ण भक्त चलते हैं वह संसार से विपरित होता है। संसार कुछ चाहता है कृष्ण भक्त कुछ और चाहते हैं। इसलिए दोनों का मिलन कभी नहीं होता।

या निशा सर्व भूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।

यस्याँ जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः।। 

.गी. 2.69

(जो सब जीवों के लिए रात्रि है, वह आत्मसंयमी के जागने का समय है और जो समस्त जीवों के जागने का समय है वह आत्मनिरीक्षक मुनि के लिए रात्रि है।)

श्रीकृष्ण कहते हैँ गीता में जो आत्मसक्षात्कारी लोग होते हैं उनके लिए जो दिन होता है वह संसारी लोगों के लिए रात है और आत्मसाक्षात्कारी के लिये जो रात है वह लोगों के लिए दिन है। तो यहाँ दिन और रात शब्द का तात्पर्य क्या है? दिन में हम क्रियाशील रहते हैं, कार्यरत रहते हैं, इधर उधर हम बहुत कुछ करते हैं, भागदौड़ करते हैं, रात को हम सो जाते हैं। तो दिन का तात्पर्य है वो समय या वो चीजें जिनमें हम बहुत रुचि लेते हैं, बहुत उत्साह लेते हैं जिनमें हम कार्यरत रहते हैं। और रात का मतलब वह समय जब हम विश्राम करते हैं, कोई कार्य नहीं करते या उस प्रकार के कार्य जिनमें हमें कोई रुचि नहीं है। तो जिन विषयों में संसार के लोगों को रुचि है कृष्ण भक्तों को रुचि नहीं है। और जिन चीजों में कृष्ण भक्तों को रुचि है संसार के लोगों को नहीं है। यदि ऐसा होता तो सारा चण्डीगढ़ यहाँ उपस्थित हो जाता। किन्तु ऐसा नहीं है और हमेशा ऐसा ही रहा है। तो दुनिया ठाठ का जीवन जीना चाहती है, ऐश का जीवन जीना चाहती है और कृष्ण भक्त सरल जीवन बिताना चाहते हैं, वो जानते हैं कि ऊँचे जीवन जीने से कोई लाभ नहीं मिलने वाला है। बल्कि बुद्धिमान लोग भगवद्गीता के अनुसार ऐसे भोग से दूर ही रहते हैं। जैसा कि श्रीकृष्ण भ.गी. में कहते हैं-

ये हिसंस्पर्शजा भोगा दुखयोनय एव ते।

आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः।। 

.गी. 5.22

(बुद्धिमान मनुष्य दुख के कारणों में भाग नहीं लेता जो कि भौतिक इन्द्रियों के संसर्ग से उत्पन्न होते हैं। हे कुन्तीपुत्र, ऐसे भोगों का आदि तथा अंत होता है, अतः चतुर व्यक्ति उसमें आनन्द नहीं लेता।)

ये संसार का भोग क्या है? जब इंद्रियों का स्पर्श इंद्रियों के विषय से होता है तो इसको भोग कहते हैं। जिस प्रकार जब कोई खुजली होती है हाथों में और हम खुजाते हैं अपने आप को, बस वो ही एक सुख है, भौतिक जगत का सुख, तथाकथित सुख। दुखयोनय एव ते, और श्रीकृष्ण कहते हैं कि यह दुख की योनि है, इसलिये जो बुद्धिमान व्यक्ति है, न तेषु रमते बुधः, वो एसे तथाकथित सुख में रमण नहीं करता है। इनसे दूर ही रहता है, ये भलिभाँति जानते हुए कि यह सुख नहीं दुख की जननी है।

सरल जीवन बिताने से दुख कम होता है

तो सरल जीवन बिताने से क्या होता है, क्या लाभ है? पहली बात यह कि हम दुख को जीवन से कम करते हैं। अब ऐसा कोई व्यक्ति नहीं होगा शायद जो ऐसा कहे कि मेरे जीवन में कोई कष्ट नहीं है कोई दुख नहीं है। कोई व्यक्ति भगवान के सामने आकर प्रार्थना नहीं करते हैं कि हे प्रभु बहुत दिनों से दुख नहीं मिला थोड़ा सा तो दुख दीजिए जीवन में। ऐसा तो कोई नहीं प्रार्थना करता। तो सरल जीवन जीने से हमारी समस्याऐं कम हो जाती हैं। जीवन के कष्ट कम हो जाते हैं। जितना हम ठाठ से जीना चाहते हैं, ऐश से जीना चाहते हैं, उतना हमारा जीवन कठिन बन जाता है, तरह तरह की समस्याऐं आने लगती हैं। एक बार एक साधू था, वह एक तीर्थ स्थान पर बैठा करता था और भिक्षा माँगा करता। तीर्थ स्थान एक पहाड़ के ऊपर था और यह साधू पहाड़ के नीचे बैठता। और जो भी व्यक्ति आते जाते, वो भिक्षा माँगता। और वैसे राम से कह देता और राम राम कहता हमेशा। एक सेर आटा दिलाईदे राम, तो जो आते वो कुछ आटा दे देते, कुछ पैसे दिला देते। कुछ अनाज दिला दे राम, तो जो जाते इधर उधर तीर्थ यात्री जाते थोड़ा कुछ अनाज देते। तो एक दिन उस साधू ने सोचा मैं भी ऊपर जाना चाहता हूँ लेकिन अब चढ़ तो नहीं सकता, पैदल तो नहीं जा सकता, तो मेरे पास कोई घोड़ी होती तो बहुत अच्छा होता। घोड़ी के ऊपर बैठकर मैं आराम से चला जाता। तो फिर प्रार्थना करने लगा राम से – एक घोड़ी दिलाईदे राम, और चमत्कार, क्या हो गया, घोड़ी उपस्थित सामने। तो घोड़ी आ गई सामने तो इन्होंने सोचा चलो चले जाते हैं, भगवान का दर्शन कर लेते हैं। लेकिन जैसे ही वो साधू उठे और घोड़ी के ऊपर बैठने लगे तो उन्होंने देखा कि घोड़ी आगे बढ़ने के लिए तैयार नहीं है। क्यों, क्योंकि घोड़ी गर्भवती थी। तो ठीक है थोड़ा इन्तजार करना पड़ेगा जब तक बच्चा न हो जाए आगे नहीं जाऐंगे। तो घोड़ी का बच्चा हो गया। फिर सोचा अब तो तैयार हो जाएगी घोड़ी आगे जाने के लिए। लेकिन घोड़ी आगे नहीं जाए बच्चे को छोड़कर। अब क्या किया जाए। तो उन्होंने सोचा ठीक है, ऐसा करते हैं, कि साथ में लेकर चले जाते हैं। तो दोनो को बिठाया लेकिन फिर भी घोड़ी आगे जाए नहीं। तो अंत में हुआ यह कि उस साधू को उस घोड़ी को ही अपने कंधे पर लादकर चढ़ना पड़ा। तो फिर वो राम से प्रार्थना करने लगा, कि पहाड़ चढ़ने वास्ते घोड़ी माँगी थी, अरे हम घोड़ी के ऊपर चढ़ने कि बजाय घोड़ी हमारे ऊपर चढ़ गई। तो संसार का ऐश या ठाठ बढ़ाने का यह परिणाम होता है।

सुख सुविधाओं को बढ़ाने के कष्ट बढ़ते हैं, जटिलताऐं बढ़ती हैं

हम तथाकथित सुविधाओं को बढ़ाना चाहते हैं ताकि हमारा जीवन बहुत सुखमय हो सुविधाजनक हो, लेकिन सुविधाऐं नहीं बढ़तीं कष्ट बढ़ते हैं। हम सोचते हैं कि यहाँ से वहाँ जाने के लिए गाड़ी अच्छी चीज है तो गाड़ी आ जाए। तो हम गाड़ी इस्तेमाल कर लेते हैं, युक्त वैराग्य है आखिर, परन्तु जब गाड़ी आ जाती है, प्रभुपाद जी कहते हैं, फिर क्या चाहिये गाड़ी के लिए – पैट्रोल। और पैट्रोल के लिए क्या चाहिए, पैसे चाहिऐं, और पैसे के लिए क्या करना पड़ता है, परिश्रम करना पड़ता है। परिश्रम करने से फिर स्वास्थ्य बिगड़ जाता है, तो फिर यहाँ ध्यान नहीं दे सकते, वहाँ ध्यान नहीं दे सकते, दिन रात मेहनत करना पड़ता है। तो एक चीज के लिए सौ चीजों की आवश्यकता होती है। और जब गाड़ी आ ही जाती है तो गाड़ी है न तो चलो गाड़ी का इस्तेमाल कर ही लेते हैं। तो इस तरह हमारे जीवन की जटिलता, विकटता बढ़ती ही जाती है, बढ़ती ही जाती है। जैसे एक अश्वत्थ वृक्ष (बरगद) बढ़ जाता है, शाखाऐं इधर-उधर होकर वो भी जड़ बन जाते हैं और नए वृक्ष उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार से तथाकथित सुविधाओं को लेकर हमारा जीवन बहुत ही कठिन हो जाता है। वास्तव में मनुष्य जीवन में क्या आवश्यक है और क्या नहीं है यह विचार करने वाली बात है।

आधुनिक जीवन शैली भगवद्भक्ति के अनुकूल नहीं

प्रभुपाद जी कहते थे कि हमारे जीवन को हमने कठिन बना दिया है, क्यों? अनावश्यक आवश्यताओं को बढ़ाकर। आप समझ रहे हैं इस बात को- अनावश्यक आवश्यताऐं – unnecessary necessities। मतलब जो वास्तव में आवश्यक नहीं है परन्तु हम इसको आवश्यक समझते हैं। और सोचते हैं कि यह हमारे जीवन में आ जाए तो बात बन जाए। और सारे विज्ञापन जो दिखाई पड़ते हैं, सारे शहर में सब जगह- बस एक यह एक चीज आप खरीद लो तो आपका जीवन सुखी हो जाऐगा। यह टेलीविजन आप खरीद लो, वाशिंग मशीन खरीद लो, ये कुछ खरीद लो, ये सिगरेट पी लो, तो बस आपका जीवन सुखमय हो जाऐगा। तो ऐसे लोगों को प्रलोभन दिया जा रहा है। आओ अपना जीवन भोग का जीवन बनाओ। सरल जीवन नहीं जियो, सरल जीवन कौन जीता है, जो प्रगतिशील आदमी नहीं है,  वो सरल जीवन जीता है। हमें सबकुछ ठाठ से जीना चाहिए। दुनिया को चमक दमक इतना प्रभावशाली है कि सब आदमी इसका शिकार होता जा रहा है। हमें भी एसी चमक दमक की दुनिया चाहिए, दो चार गाड़ियाँ हों, दो चार टेलीविजन हों, अच्छा बँगला हो, अच्छे-अच्छे चमकदार आधुनिक फैशन के कपड़े हों, अच्छे-अच्छे होटलों में जाकर हम खाँऐं पिऐं।  तो यही सब आजकल का सिद्धांत है। तो ऐसे क्या होता है? हम भगवान को भूलते जाते हैं, भूलते जाते हैं कि इन चीजों में इतना उलझ जाते हैं कि न तो भगवान के लिए इतना समय होता है न कोई शक्ति रहती है न कोई इच्छा रहती है। तो प्रभुपाद जी कहते हैं कि हमारा जीवन हमें सरल बनाना चाहिए। क्यों बनाना चाहिए सरल, एक तो बात है कि कष्ट बँट जाता है, कष्ट कम हो जाता है, दूसरी बात यह है ताकि हम ऊँचे विचार कर सकें।

ऊँचे विचार का क्या अर्थ है

ऊँचे विचार मतलब क्या? ऊँचे विचार का मतलब यह नहीं है कि ऊँचे आसमान में हम ऐयरोप्लेन में उड़ें, और गगनचुंबी अट्टालिकाओं में हम निवास करें। दुबई जैसे देश में आजकर सबसे बड़ी इमारत है, 160 मंजिल वाली। और कई साल पहले जब हम दुबई गए थे  वहाँ देख रहे थे कि ऐसे हजारों बड़ी-बड़ी इमारतें बनती जा रही हैं। हमनें सवाल यह किया कि इनमें रहेगा कौन इसमें। इतने सारे बड़े-बड़े इमारत बनाते जा रहे हैं। और हमने विचार किया कि बस एक हल्का सा भूकम्प आ जाए न छोटा सा, भगवान न करे ऐसा हो, परन्तु कुछ भी हो सकता है, जापान में हमने देखा न, एक छोटा सा बस धरती का कम्पन्न हो जाऐ, थोड़ासा। बस खत्म, एक क्षण में सबकुछ खत्म। आप जमीन में है, कुछ तो कर सकते हैं। 150वीं मंजिल पर आप क्या कर सकते हैं। कहाँ जाऐँगे, कहाँ भागेंगे, क्या करेंगे। टोक्यो में लोग बता रहे थे जब इस साल भूकम्प हुआ तो बड़ी-बड़ी जो ईमारतें थीं पचास मंजिल वाले सौ मंजिल वाले वो यूँ हिल रहे थे, तो कल्पना कीजिए कि ऊपर रहने वालों की क्या हालत हुई होगी। तो यह है हमारी प्रगति। तो इस प्रकार का ऊँचा विचार नहीं। ऊँचे विचार का मतलब है आध्यात्मिक विचार। भोग से परे उठना। यह समझना कि भगवान की प्राप्ति करना, भगवान का शुद्ध भक्त बनना ही हमारे जीवन का उद्देश्य है। तो ऐसे ऊँचे उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए हमारा जीवन सरल होना चाहिए क्योंकि सरल जीवन ऐसे उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अनुकूल होता है।

आधुनिक जीवन शैली भोग की प्रवृत्ति पर आधारित

परन्तु लोग इस बात को मानते नहीं हैं। यह कहते हैं कि यह तो पुराने जमाने की बात है। अभी तो आधुनिक जमाना है, अभी तो गाड़ियों में घूमना, मोटर साईकिलों में बैठकर इधर-उधर जाना, होटलों में खाना पीना सब जगह। और यह बॉलीवुड और सिनेमा ने हमारी संस्कृति को पूरी तरह नष्ट कर दिया है। ऊँचा विचार का नाम ही नहीं रहा अभी। और सभी लोग सिनेमा के अभिनेता अभिनेत्री बनना चाह रहे हैं, अच्छे-अच्छे घरों के बच्चे भी आजकर जाते हैं। और यही हमारे नेता बन गए हैं, हमारे भगवान बन गए हैं। किसी भी कॉलेज के हॉस्टल में जाईए तो कमरों में क्या तस्वीरें देखेंगे आप, कि सब सिनेमा के अभिनेता अभिनेत्री हैं या कोई संगीत के कोई संगीतकार हैं या कोई क्रिकेट के खिलाड़ी हैं, बस यही इनके नेता आदर्श हैं यही। तो फिर ऊँचे विचार आऐंगे कहाँ से। जब तक भक्तों का संग न हो, तब तक ऊँचे विचार मन में आने की सम्भावना नहीं है। और भक्तों के संग में आने के बाद भी यदि हमने सरल जीवन को अपनाना नहीं चाहा हमारे लिए भक्ति बहुत मुश्किल हो जाऐगी। या कृष्ण या माया। दोनों में एक को हमें चयन करना होगा। तो भोग वृत्ति एक मिथ्या पर आधारित है। तो क्या है वो मिथ्या। कि मैं भोक्ता हूँ। मैं नियंत्रणकर्ता हूँ, मैं स्वामी हूँ।

असली भोक्ता भगवान हैं

परन्तु भगवान गीता में बताते हैं-

भोक्ताराम यज्ञ तपसां सर्व लोक महेश्वरम्।

सुहृदं सर्व भूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति।।

.गी. 5.29

(मुझे समस्त यज्ञों तथा तपस्याओं का परम भोक्ता, समस्त लोकों तथा देवताओं का परमेश्वर एवं समस्त जीवों का उपकारी एवं हितैषी जानकर मेरे भावनामृत से पूर्ण पुरुष भौतिक दुखों से शान्ति लाभ करता है।)

कि मैं समस्त लोकों का स्वामी हूँ इसलिए मैं ही भोक्ता हूँ। भोग कौन कर सकता है? जो स्वामी है वही मात्र भोग कर सकता है, यदि हमारी सम्पत्ति नहीं है ये तो हम नहीं भोग कर सकते इसका। मैं आपके घर पर आकर बिना आपकी अनुमति के आपका फ्रिज खोल दूँ, सारा भोजन ले लूँ, आपकी गाड़ी उठा लूँ, इधर-उधर घूमने चले जाऊँ, घर में जो भी है वह उठा कर ले जाऊँ, बिना आपकी अनुमति के, तो क्या यह ठीक रहेगा। क्योंकि यह आपकी चीजें हैं, आपकी अनुमति के बिना मैं कैसे ले जा सकता हूँ? ठीक उसी प्रकार से सृष्टि में जो कुछ भी है वह किसका है? क्या हमारा है? भगवान का है।

ईशावास्य इदं सर्वम् यत किन्च जगत्यां जगत।

तेन त्यक्तेन भुन्जीथा मा गृधः कस्य स्विद धनम्।।

ईशोपनिषद में कहा गया है कि सबकुछ भगवान श्रीकृष्ण का है। और इसलिए हम यह अच्छी तरह से जानकर हमें उतना ही इस्तेमाल करना चाहिए जितना कि भगवान ने हमारे लिए रखा है। हमारे लिए जितना आवश्यक है उतना ही हमें स्वीकार करना चाहिऐ। यह जानते हुए कि इससे अधिक जो भी हमारे पास है वह भगवान की सेवा के लिए होना चाहिए। यदि इस बात को हम नहीं मानते हैं तो हमारी संसार की ईमानदारी की कोई कीमत नहीं है।

प्रभुपाद जी कहा करते थे कि यदि कोई डकैत हों वो बैंक में डाका डाल दें और खूब पैसा चोरी करके ले आऐँ और चोरी करने के बाद समझ लिजिए कि उन्होंने दस लाख रूपये चोरी कर लिए और वो चार चोर हैं और उऩ्होंने ईमानदारी से अढ़ाई लाख आपस में बाँट लिए और कहा कि देखो हम कितने ईमानदार हैं हमने समझौता किया था  चोरी करने के पहले  कि जो भी धन मिलेगा हम आपम में समान रूप से बँटवारा करेंगे। और जैसे हमने कहा था वैसे ही किया। हम तो बड़े ईमानदार हैं तो क्या बात मानेंगे उनकी? क्यों नहीं मानेंगे? क्योंकि इनकी ईमानदारी तो एक झूठ पर आधारित है। एक गलत काम पर आधारित है, चोरी पर आधारित है। तो ऐसी ईमानदारी का क्या मूल्य है? ठीक उसी प्रकार से जब तक हम यह नहीं मानते हैं कि सब भूमि गोपाल की, कि सबकुछ भगवान कृष्ण का है तब तक हमारी ईमानदारी किस काम की? कोई मूल्य नहीं ऐसी ईमानदारी का। प्रभुपाद जी कहा करते थे कि रूस में जिन दिनों में साम्यवाद वहाँ प्रारम्भ हुआ एक क्रांति हुई वहाँ, राजा को हटाया गया, और साम्यवादी लोग राज्य करने लगे तो ये गाँव-गाँव में जाकर मासूम किसानों को भगवान के सेवा करने से दूर हटाना चाहते थे। वो उनको जाकर कहते कि देखो अब अकाल पड़ गया है, अब तुम्हारे भगवान से माँगो, क्या तुम्हें भगवान अनाज देगा। तुम्हें गेहूँ देगा, और तब आके हमें जवाब देना। वो लोग अपने चर्च वगैरह में चले जाते और एक दो दिन के बाद फिर ये साम्यवाद पार्टी के लोग चले आते, तो भगवान ने तुम लोगों को गेहूँ दिया? नहीं दिया। ये साम्यवाद पार्टी, कम्यूनिस्ट पार्टी आपको देगी, ये ले लिजिए गेहूँ। तो कौन ब़ड़ा है, भगवान बड़े हैं या साम्यवाद पार्टी बड़ी है? तो फिर वो बेचारे मासूम थे, हाँ हाँ साम्यवाद पार्टी बड़ी है। आपके सदस्य हम भी बन जाऐंगे। हम भी नास्तिक बन जाऐंगे। भगवान हमारे लिए कुछ नहीं देंगे। लेकिन उनको ये नहीं पता चला कि जो गेहूँ जो अनाज उन्होंने भेजा वो भी तो भगवान ने ही भेजा था साम्यवाद पार्टी के द्वारा केवल उनको निमित्त बनाकर भेजा, इतना ही है। तो साम्यवादी लोग क्या कहते हैं कि सबकुछ राष्ट्र का है। परन्तु इतना करने के बाद भी वो सफल नहीं हो पाए हैं। क्यों इसका कारण क्या है? इसका कारण यह है कि हृदय से वो लोभ को हटाने में वो सफल नहीं हुए हैं। जबतक लोभ रहेगा व्यक्ति के हृदय में चाहे साम्यवाद हो, प्रजातन्त्र हो, ये वाद हो वो वाद हो, बात नहीं बनेगी। हमें सरल जीवन जीना काफी नहीं है। साम्यवादी लोग भी यही कहते हैं कि सरल जीवन जियो लेकिन ऊँचे विचार नहीं होते उनके। इसलिए उनकी योजना असफल हो जाती है। लेकिन साथ-साथ सरल जीवन और ऊँचा विचार दोनो हो जाता है तो फिर हम बड़े सुखी होकर रह सकते हैं। और यह भक्ति का जीवन है। हमें चाहिए कि भले हम शहर में रहें या हम गाँव में रहें हमें जितना हो सके जीवन को सरल बनाने के प्रयास करना चाहिए।

क्या आवश्यक है और क्या नहीं है इसका चयन कैसे करना चाहिए?

कई बार लोग यह सवाल करते हैं कि क्या आवश्यक है और क्या नहीं है इसका चयन कैसे करना चाहिए? अब हमारे लिए मोबाईल फोन हो या गाड़ी हो या ये हो वो हो उपकरण इतने सारे आजकल हैं वो सब आवश्यक हैं। और कोई कहते हैं कि आवश्यक नहीं हैं तो क्या करना चाहिए। इसका उत्तर यह है कि कम से कम आपके पास इस समय जो है उससे तो सन्तुष्ट रहें। इसको और आगे बढ़ाईये मत। जितना है उसी को बनाए रखिए और ज्यादा से ज्यादा समय भगवान की भक्ति करने में बिताईए। जितना हम हमारी आवश्यकताओं को बढ़ाऐंगे वैसे वैसे हमारा मन भगवान से हटता चला जाएगा। वृन्दावन के 6 गोस्वामियों ने अपने जीवन से सिखाया सारी दुनिया को कि सरल जीवन ऊँचा विचार क्या चीज है। हाँ हम उनकी नकल तो नहीं कर सकते जिस तरह से षड्गोस्वामी रहा करते थे वृन्दावन में हम वैसे रहने का प्रयास करेंगे तो हम एक दिन में मर ही जाऐंगे। रघुनाथ दास गोस्वामी दिन में एक बार थोड़ा सा छास लेते थे बस। और वो भी कभी कभी भूल जाते थे। हर दिन अलग अलग पेड़ के नीचे निवास करते थे। कभी कभी एक घण्टा, डेढ घण्टा, चौबीस घण्टे में सो जाते थे और कभी कभी वो भी भूल जाते थे। दिन भर भगवान कृष्ण की सेवा में व्यस्त रहते थे। तो ऐसे उनका जीवन था। तो जब हम कहते हैं कि षडगोस्वामी से हमें प्रेरणा प्राप्त करनी चाहिए तो हम यह नहीं कह रहे हैं कि हमें बिल्कुल उनकी तरह ही रहना चाहिए, उनकी नकल करनी चाहिए, ऐसा नहीं कह रहे हैं। परन्तु कम से कम व्यक्ति प्रेरणा प्राप्त करके हम हमारा जीवन थोड़ा बहुत तो सरल बना ही सकते हैं। अब जो हमारी परिस्थिति है उस परिस्थिति में हमें जीवन की आवश्यकताओं को कम बनाना चाहिए। अगली बार आपके मन में विचार आए कि हमें नया वाशिंग मशीन खरीदना है या नया उपकरण खरीदना है तो जरा सोचिए- क्या वास्तव में यह आवश्यक है मेरे लिए? क्या इसके बिना हम जी नहीं सकते? देखिए हमारे बुजुर्ग जो थे हमारे पूर्वज पचास साल पहले, सौ साल पहले, उस समय तो कोई कम्प्यूटर नहीं थे, कोई मोबाईल फोन नहीं थे, कैमरा नहीं था, टीवी नहीं था, क्या वो लोग सुखी नहीं थे? बल्कि हमसे ज्यादा सुखी थे।

आधुनिक जीवन शैली में इंसान इंसान से दूर होता जा रहा है

आजकल क्या हो रहा है इन सब चीजों के बीच में रहकर इंसान के बीच में प्रेम खत्म होते जा रहा है।  परिवार के सदस्य भी एक दूसरे से बात नहीं करते। एक समय बम्बई में हम कहीं जा रहे थे, एक ईमारत में तो ऊपर चढ़ते जा रहे थे, हमें दूसरी मंजिल में जाना था तो पहली मंजिल में किसी का दरवाजा खुला था। तो जाते जाते नजर अंदर गई। तो चार-पाँच लोग अंदर बैठे थे भोजन ले रहे थे लेकिन सारे लोग टीवी को देख रहे थे। आपस में बातचीत नहीं कुछ नहीं। नीचे थाली में भी नहीं देख रहे थे। पाँचों के पाँचों लोग केवल टीवी की ओर देख रहे हैं एकाग्रचित्त से। तो परिवार ऐसे बन गए हैं। जहाँ मंदिर हुआ करता था घर के अंदर अब वो स्थान टीवी का हो गया है। टीवी हमारे आधुनिक जमाने का भगवान है। हमारे गुरू हैं, हमारे सर्वस्व हैं। सारा मार्गदर्शन सारी चीजें हमें टीवी से ही सीखने को मिलती हैं। छोटे बच्चों को पूछो तो वो टीवी के विज्ञापन आपको सुनाऐंगे। कौनसी चीज बहुत अच्छी है सारी जानकारी बच्चों को रहती है क्योंकि वो दिन भर टीवी देखते हैं। और बच्चे क्यों टीवी देखते हैं क्योंकि माता पिता भी देखते हैं साथ साथ। तो यही संस्कृति चल रही है। तो कैसे समाज का भला हो सकता है?

सच्चा धन, सच्चा आनन्द भगवान की भक्ति में

सच्चा आनन्द तो भक्ति में है। सरल जीवन में ही सच्चा आनन्द है। सच्चा धन हमारा है भक्ति का धन। सनातन गोस्वामी जब वृन्दावन में रहा करते थे तो एक बार एक व्यक्ति उनके पास आए जिनका नाम था श्रीजीवन चक्रवर्ती। वो बंगाल से आए हुए थे। वो एक शिव भक्त थे और कई वर्षों से वो शिवजी से प्रार्थना करते थे कि मुझे धन दीजिए, धन दीजिए, धनम् देही, धनम् देही तो आखिर शिवजी ऊब गए कि बार बार यही चीज मुझसे माँग रहा है। तो क्या किया जाए। तो शिवजी उसके सपने में आए- भई मुझसे यह धन बार बार पूछना नहीं तुम्हें धन चाहिए तो जाओ वृन्दावन, वहाँ सनातन पाद गोस्वामी बैठते हैं तो उनसे पूछो। वो तुम्हें धन दे देंगे। तो श्रीजीवन चक्रवर्ती चले गए बंगाल से वैसे वो बनारस में गए थे, वो बनारस कई वर्ष रहे थे क्योंकि वो तो शिव जी का स्थान है। फिर बनारस से आगे चले गए वृन्दावन। उन्होंने ढूँढ निकाला सनातन गोस्वामी को जो अपना भजन करते हुए बैठे थे। तो पहले सनातन गोस्वामी ने बात ही नहीं सुनी उनकी क्योंकि वो तो अपने भजन में मग्न थे फिर वे आकर बात करने लगे। फिर सनातन गोस्वामी ने आँखें खोल दीं। अच्छा बताईए हम आपकी क्या सेवा कर सकते हैं। तो उन्होंने बताया कि शिवजी के हम उपासक हैं, शिवजी हमारे सपने में आए और मैं उनसे धन माँग रहा था अनेक वर्षों से परन्तु उन्होंने मुझे आपके पास भेजा तो सनातन गोस्वामी को लगा कि मैं तो विरक्त व्यक्ति हूँ मेरे पास कोई धन नहीं आप देख रहे हो न मेरे कपड़े हैं मेरे पास न घर कुछ भी नहीं है मेरे पास तो  मैं आपको क्या दे सकता हूँ। तो वह श्रीजीवन चक्रवर्ती सोचने लगा कि हो सकता है कि जो मैंने सपना देखा वो सपना नहीं था कोई भ्रम हुआ होगा वो। तो निलाश होकर वो चले गए। उधर सनातन गोस्वामी सोचने लगे कि शिवजी ने ऐसा क्यों कहा। कोई तो योजना रही होगी। सनातन गोस्वामी और शिवजी का सम्बन्ध बड़ा अच्छा था। एक बार शिवजी ने सनातन गोस्वामी को मच्छरों से मुक्त कर दिया था। चक्रेश्वर तीर्थ नाम के स्थान में ही सनातन गोस्वामी जप करने बैठते थे, गोवर्धन के पास मानसी गंगा के तट पर। और एक दिन वो इतने परेशान हुए इतने मच्छर काट रहे थे कि वो अपना भजन ठीक से नहीं कर पा रहे थे। तो उन्होंने सोचा कि यहाँ से चले जाना होगा। वहाँ पर वास्तव में चक्रेश्वर महादेव हैं। बृज में एक महत्वपूर्ण शिवलिंग है वो। चक्रेश्वर महादेव। तो जब शिवजी को पता लगा कि सनातन गोस्वामी इस स्थान को छोड़कर चले जाने वाले हैं तो उनको अच्छा नहीं लगा वो भी सनातन गोस्वामी का संग चाहते थे क्योंकि शिवजी तो परम वैष्णव है न। तो वो सपने में आए सनातन गोस्वामी के और उन्होंने कहा कि कोई बात नहीं आप यहाँ से इस स्थान को छोड़के नहीं जाना, मच्छर आज से आपको तंग नहीं करेंगे। आप तो जानते हैं कि भारत में सबकुछ जानपहचान से ही चलता है। और शिवजी की पहुँच तो बहुत ऊँची है। तो मच्छरों के देवता हैं उनसे शिवजी ने फोन उठा कर बात कर लिया कि भई देखो इनको तंग नहीं करना जरा देखना ये बड़े भक्त हैं। तो काम बन गया बात हो गया। और आज भी ऐसे कहा जाता है कि चकलेश्वर तीर्थ में कोई मच्छर नहीं है। ऐसे लोग कहते हैं। जाकर हमने बात की परीक्षा तो नहीं की है। परन्तु ऐसा लोग कहते हैं। तो खैर सनातन गोस्वामी और शिवजी का सम्बन्ध काफी है। तो सनातन गोस्वामी सोचने लगे कि क्या उद्देश्य हुआ होगा शिवजी का इस व्यक्ति को हमारे पास भेजने से। फिर उनको याद आया कि हाँ मेरे पास एक पारसमणि है जोकि मैंने कूड़ादान में फेंक दिया है। पारसमणि आप जानते हैं न। क्या है पारसमणि। जिसका स्पर्श करने से सोना बन जाए। तो पारसमणि मैंने वहाँ रखी है कूड़ादान में तो शायद यह व्यक्ति धन के लिए ललायित है तो इसको वो दे देते हैं। तो किसो उन्होंने भेजा कि उस व्यक्ति को जरा बुलाईए आप तो वो चले आए। आपको धन चाहिए। हाँ हाँ , बड़ी कृपा होगी आपकी, अब तो दे दीजिए। तो वहाँ कूड़ा दान है देखिए वहाँ जाईए वहाँ एक पारसमणि है ले लिजिए। तो श्रीजीवन चक्रवर्ती चले गए और देखा तो वास्तव में वहाँ एक पारसमणि था तो बड़े आश्चर्यचकित हो गए आनन्दित हो गए। उठा कर नाचते कूदते चले गए फिर जाते जाते उनके मन में  एक विचार आया। क्या विचार? कि यह पारसमणि है जिस वस्तु का स्पर्श इस पारसमणि से होता है वह सोना बन जाता है तो इतना सोना मिल सकता है लेकिन यह महात्मा ने इस पारसमणि को कचरे में डाल दिया है। तो इसका मतलब यह है कि इनके पास इस पारसमणि से भी अधिक कोई मूल्यवान वस्तु है मुझे वो चाहिऐ। देखिए लोभ ऐसी चीज होती है न हाथ में जोभी कुछ आ जाऐ हमें और चाहिए जैसे हम आज दोपहर में चर्चा कर रहे थे ये दिल मांगे मोर। हमें और चाहिए, और चाहिए। दुनिया की जो बीमारियाँ है जो डॉक्टर कहते हैं वो सही बीमारियाँ नहीं हैं। डॉक्टर क्या कहता है HIV वगैरह ये सब सही बीमारियाँ नहीं हैं। वास्तव में बीमारियाँ क्या है ये दिल माँगे मोर। ये सबसे बड़ी बीमारी है। जितना भी आ जाए असन्तुष्ट रहते हैं और चाहिए, और चाहिए। तो खैर ये व्यक्ति वापस चले आए सनातन गोस्वामी के पास। तो सनातन गोस्वामी बड़े बुद्धिमान थे। सनातन गोस्वामी ने कहा, मेरे पास अवश्य इस पारसमणि से भी अधिक मूल्यवान कोई वस्तु है। परन्तु यदि आप वो चाहते हैं तो आपको इस पारसमणि को त्यागना होगा। क्या। जाकर जमुना जी में फेंक आइए। तो श्रीजीवन चक्रवर्ती को प्रायः हृदय का दौरा हो गया। अब इतने वर्षों के बाद यह पारसमणि प्राप्त हो गई अब ये महात्मा जी कह रहे हैं कि ये जमुनाजी मे फेंक कर आइए। अब क्या करें। एक ओर डर था दूसरी ओर लालच। लोभ और डर के बीच में संघर्ष हुआ। कि क्या किया जाए। लालच जीत गया। कहा ठीक है मैं जाता हूँ। बड़े भारी हृदय से वो पारसमणि ली आँख बंद की, वो सहन नहीं कर सकते थे वो दृश्य कि वो पारसमणि जल में चला जाए और कभी आईँदा प्राप्त न हो। और पारस मणि को जमुनाजी में डाल दिया और वापस चले आए। गोस्वामी जी अब दे दीजिए क्या है आपके पास वो कौनसा अनमोल धन है आपके पास। मैं तो वो पारसमणि फेंक कर आया देखिए। आपने जैसे किया मैंने किया अब आप देखिए। तो सनातन गोस्वामी ने कहा अवश्य आपको चाहिए न तो ये लिजिये- हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। अरे गोस्वामी जी मजाक मत कीजिए। प्रायः दूसरा हृदय का दौरा आ गया श्री जीवन चक्रवर्ती को। अब तो फेंक दिया कि मजाक कर रहे हैं हरे कृष्ण बोल रहे हैं, वो पारस मणि रख ली होती तो कम से कम कुछ होता। तो सनातन गोस्वामी ने कहा नहीं नहीं वास्तविक धन यही है। और फिर सनातन गोस्वामी ने प्रचार किया उनको। भगवान कृष्ण के बारे में बताया, कृष्ण भक्ति के बारे में बताया, मनुष्य जीवन के महत्व के बारे में बताया, और उस व्यक्ति को कृष्ण भक्त बना दिया। और इस प्रकार वह व्यक्ति धनी हो गया। सबसे बड़ा धन उसे प्राप्त हो गया भगवान कृष्ण की भक्ति। तो सरल जीवन जो आदमी जीता है वो सबसे धनी व्यक्ति बन जाता है। ऐसा नहीं है कि हम दुनिया की सम्पत्ति से इतना सम्बन्ध नहीं रखेंगे तो हम दरिद्र हो जाऐंगे। नहीं। सबसे बड़ा धन हमें मिलेगा। बल्कि प्रभुपाद जी बताते हैं कि कृष्ण का नाम है दीनबन्धु। दीनों के बन्धु हैं वो। परन्तु दीन कौन है। जिसके पास कृष्ण नहीं है वो दीन है। भले वो करोड़पति ही क्यों ने हो। जिसके पास कृष्ण नहीं है वो गरीब है। और जिसके पास कृष्ण हैं भले वो भौतिक दृष्टि से गरीब ही क्यों न हो वो वास्तव में सबसे अमीर है, सबसे धनी व्यक्ति है। तो ऐसे श्रीजीवन चक्रवर्ती भी धनी बन कर चले गए।

भगवान के लिए शानदार जीवन भक्त के लिए सादा जीवन

उधर सनातन गोस्वामी वृदावन में रहते थे तो जब वो पहले आए थे वृन्दावन में तो एक बार माधुकरी करते करते वो मथुरा तक पहुँचे, मथुरा में एक ब्राह्मण रहा करते थे जिनका नाम था दामोदर चौबे और उनकी पत्नी। वो पत्नी और दामोदर चौबे दोनों कृष्ण के शुद्ध भक्त थे। उनका एक बच्चा था, लड़का। और उसके पास कृष्ण का एक विग्रह था, मदन गोपाल जी का विग्रह। ये विग्रह वास्तव में अद्वैत आचार्य को प्राप्त हुआ था। जब अद्वैत आचार्य वृन्दावन छोड़ के जा रहे थे तो उन्होंने दामोदर चौबे जी को दे दिया कि आप इनकी सेवा कर लो। तो दामोदर चौबे और उनकी पत्नी और उनका लड़का मदन गोपाल जी की सेवा ऐसे करते थे कि मानो वो उनका लड़का है उनका भाई है। दामोदर चौबे और उनकी पत्नी मदन गोपाल को अपना पुत्र मानते थे, वात्सल्य भाव से उनकी सेवा करते थे और उनका जो लड़का था वो तो मदन गोपाल को अपना भाई समझता था अपना मित्र समझता था। कभी कभी दोनो लड़ते थे झगड़ते थे साथ में जैसे कभी कभी दो बच्चे लड़ते हैं झगड़ते हैं। साथ-साथ में खाते थे। तो सनातन गोस्वामी जब आते थे कभी कभी माधुकरी के लिए तो ये सब देखते थे और उन्होंने उन्हे बार बार समझाने का प्रयास किया अर्चा विग्रह की सेवा ऐसे नहीं की जाती। थोड़े नियम पालन किया जाना चाहिए। परन्तु वो इतने स्वाभाविक प्रेम के स्तर में थे कि वो ये सब कर नहीं पाए। एक बार जब सनातन गोस्वामी जब वहाँ आए तो उन्होंने देखा कि दोनो बच्चे अर्थात मदन गोपाल का विग्रह और दामोदर चौबे का लड़का दोनो साथ में बैठकर खा रहे हैं। तब सनातन गोस्वामी समझ गए कि ये साधारण भक्त नहीं हैं। और वास्तव में भगवान इनसे ऐसी सेवा स्वीकार करना चाहते हैं। तो सनातन गोस्वामी ने दामोदर चौबे और उनकी पत्नी से कहा कि जैसे आप सेवा कर रहे हैं वैसे ही सेवा करते रहिए। आज से हम आपको कुछ नहीं कहेंगे। आपकी सेवा तो बढ़िया है। ये वृन्दावन की सेवा है, फिर सनातन गोस्वामी चले गए लेकिन मदन गोपाल सनातन गोस्वामी की सेवा स्वीकार करना चाहते थे तो सनातन गोस्वामी के स्वप्न में वो आए और दामोदर चौबे की पत्नी के स्वप्न में भी आए उसी समय और कहा दामोदर चौबे की पत्नी से कि मैं सनातन गोस्वामी के पास जाना चाहता हूँ, मैं उनकी सेवा स्वीकार करना चाहता हूँ तो मुझे उनके हवाले कर दो। और सनातन गोस्वामी के सपने में आकर कहने लगे कि दामोदर चौबे के पास जाना और मुझे ले आना और मेरी सेवा करना। तो दोनों ही बड़े आश्चर्यचकित हो गए- दामोदर चौबे और सनातन गोस्वामी। बड़े आनन्द से मदन गोपाल की मूर्ति ले आए। बाद में यह मदन गोपाल की मूर्ति किस नाम से जानी गई, मदन मोहन। तो सबसे पहला मंदिर जो वृन्दावन में बना वो मदन मोहन जी का बना। तो पहले मदन मोहन जी मदन गोपाल के नाम से जाने जाते थे। तो खैर जब मदन गोपाल की मूर्ति पहले सनातन गोस्वामी को मिली थी तो उस समय कोई मंदिर तो थे नहीं वृन्दावन में, सनातन गोस्वामी का कोई भजन कुटीर भी नहीं था तो केवल एक थैली में रखके जैसे हम जपमाला थैली में लटका कर जाते हैं वैसे सनातन गोस्वामी मदन गोपाल को ले जाया करते थे इधर-उधर। और रात के समय जिस पेड़ के नीचे वो सोते थे तो उसी पेड़ पर किसी शाखा पर मदन गोपाल जी को रख देते  थे सुरक्षित। अगले दिन फिर सुबह उस विग्रह को लेकर वो आगे चलते थे। जो भी थोड़ा बहुत उनको माधुकरी में उनको मिल जाता था, कुछ भी सूखा, रूखा, शाक यो कोई रोटी आदी वो चढ़ाते भोग मदन गोपाल जी को। तो एक दिन मदन गोपाल जी ने कहा कि अरे सनातन ये सब रोटी आदी खिला रहे हो कम से कम इसमें कुछ नमक तो डालो न। एसे तुम खिलाते जाओगे क्या रोटी। तो सनातन गोस्वामी ने उत्तर दिया, देखिए आज नमक चाह रहे हो, कल घी मांगोगे, शक्कर मांगोगे। मैं तो भिक्षुक हूँ, जो आप दिलाते हो वही तो मुझे हाथ में मिलता है न। अब मैं थोड़ी जाकर अभी सब जगह से धन एकत्र करुँगा, तो मेरे लिए तो सम्भव नहीं है। जो मुझे मिलता है आपकी कृपा से वही आपको स्वीकार करना होगा। तो फिर मदन गोपाल चुप बैठ गए। भगवान अपने भक्त के सामने क्या कह सकते हैं, कुछ नहीं कह सकते, भगवान के भक्त उनसे ज्यादा बुद्धिमान होते हैं। तो खैर फिर सनातन गोस्वामी के मन में इच्छा हुई कि मदन गोपाल की सेवा ऐसे नहीं होनी चाहिए, बड़े ठाठ से होनी चाहिए, बढ़िया सेवा होनी चाहिए उनकी तब मदन गोपाल ने सनातन गोस्वामी की इच्छा जान ली। तो एक धनी व्यापारी थे जो चण्डीगढ से जा रहे थे उनका नाम था रामदास कपूर और वो जा रहे थे आगरा की ओर जमुना में नौके में बैठकर जा रहे थे और अचानक उनका नौका जो है वो रेती में जो नदी की रेती में अटक गया और वहाँ से आगे नहीं बढ़ा, यह सब भगवान की योजना थी। तो वो बेचारे बाहर आए और लोगों से पूछा कि भई कोई हमारी मदद कर सकता है। तो लोगों ने कहा कि वहाँ बहुत पहुँचे हुए संत हैं सनातन गोस्वामी तो आप उनके पास जाईए अवश्य  वो कोई चमत्कार कर देंगे। तो रामदास कपूर आए सनातन गोस्वामी के पास और कहने लगे महात्मा जी मेरी यह समस्या है कृपया मदद कीजिए। तो सनातन गोस्वामी ने कहा कि मैं क्या मदद कर सकता हूँ, मैं तो एक वैरागी हूँ यहाँ बैठा हूँ, नौकों के बारे में क्या जानता हूँ, आपका नौका अटक गया है तो ऐसा कीजिए कि मदनगोपाल जी के पास जाईए वो आपकी इच्छा पूर्ण करेंगे। तो रामदास कपूर मदन गोपाल जी के पास गए। उनसे निवेदन किया कि प्रभु मेरी ऐसी समस्या है इसका कोई उपाय निकालिए और वो चले गए। उस रात अचानक बहुत वर्षा हुई और पानी नदी में बहुत बढ़ गया, ऊँचाई  बढ़ती गई और फिर नौका अपने आप बालू से मुक्त होके अपने आप आगे निकल पड़ा। तो आगे चलके रामदास कपूर ने वो जो माल था नौके में ले गया था उसे बहुत अच्छे मुनाफे में बेच दिया। खूब कमा लिया पैसा। रामदास कपूर समझ गए थे कि यह मदन गोपाल जी की कृपा है। इसलिए जो भी धन मैंने इन चीजों को बेचकर कमाया है वो मदन गोपाल जी की सम्पत्ति है, ये मेरी सम्पत्ति नहीं है। इसलिए वो सारा धन लेकर सनातन गोस्वामी के पास आया। अब ये आपके हवाले हम कर रहे हैं। तो सनातन गोस्वामी ने कहा कि मैं इसे लेकर क्या करूँगा आप मदन गोपाल जी के लिए मंदिर बनाओ। तो ऐसे वृन्दावन का सबसे पहला मंदिर बना। फिर भी इतना शानदार मंदिर बना भगवान के लिए परन्तु सनातन गोस्वामी जैसे रहते थे वैसे ही रहे। भगवान के लिए शानदार सेवा, शानदार जीवन, अच्छा भोग, परन्तु सेवक के लिए साधारण जीवन, सादा जीवन ऊँचे विचार। तो उसी प्रकार से जब हम  भगवान की सेवा करते हैं, भगवान के लिए हमें सबकुछ देना चाहिए जितना हो सके भगवान के लिए सेवा अच्छी होनी चाहिए परन्तु हमारे लिए जीवन सादा होना चाहिए, सरल होना चाहिए। तो सनातन गोस्वामी बड़े प्रसन्न हुए कि अब मदन गोपाल के लिए बढ़िया मंदिर अब बन गया है और भोग के लिए भी रामदास कपूर ने अच्छी व्यवस्था कर दी है, बढ़िया रसोई घर बनाया। तो इस तरह मदन गोपाल जी, बाद में मदन मोहन नाम हुआ उनका। अनेक वर्षों बाद जब मुसलमानों का आक्रमण हुआ वृन्दावन पर, मुगलों का, तो उस समय वृन्दावन की जो मूल मूर्तियाँ थीं वो पुजारी वहाँ के वृन्दावन से राजस्थान चले गए जयपुर और पासवाले स्थानों में क्योंकि वहाँ के जो राजपूत राजा थे बड़े शूरवीर राजा थे वो वैष्णव थे और मुगल राजा वहाँ नहीं जाते थे तो मदन मोहन की मूर्ति जयपुर के राजा के पास आ गई, उन्होंने मंदिर बनवाया और मदन मोहन जी की सेवा की। उनकी एक कन्या थी राजकुमारी। तो राजकुमारी का विवाह होना था और विवाह होना था करौली राज्य के राजकुमार से। करौली जयपुर के पास में ही है। आप में से हो सकता है कई भक्त गए होंगे जयपुर या करौली। तो जब उनकी कन्या का विवाह होने जा रहा था तो कन्या ने कहा कि दहेज के साथ आपको मदन गोपाल जी साथ में देने होंगे, मदन मोहन जी। तो राजा भी बड़ा प्रेम करते थे मदन मोहन जी से तो दोनो चाहते थे मदन मोहन जी को रखने के लिए तो राजा ने सोचा क्या किया जाए। राजा ने अपनी पुत्री से कहा – ठीक है तुम अपनी आँखें बंद कर लो और तुम्हारे सामने यहाँ कई विग्रह रखे जाऐंगे तो जिस विग्रह को तुम चुनोगे वही विग्रह तुम लेकर जाना तो पुत्री ने स्वीकार कर ली बात। पुत्री ने मदन मोहन जी से प्रार्थना की  कि अब क्या किया जाए तो मदन मोहन जी ने सपने में उस राजकुमारी से कहा कि चिन्ता नहीं करना तुम्हारे आँखों पर पट्टी तो होगी लेकिन अपनी ऊँगलियों से तुम देखना कि मेरी जो भुजाऐं हैं वो बहुत कोमल हो जाऐंगी। तो स्पर्श करने से तुम्हें पता चलेगा कि मैं कौन हूँ और दूसरे विग्रह कौन हैं। तो राजकुमारी ने ऐसे ही ऊँगलियों से स्पर्श कर लिया और तुरन्त पता चल गया कि ये मदन मोहन हैं और चुन लिए और राजा ने बड़ी खुशी से बेटी को अपने नए घर भेज दिया मदन मोहन जी के साथ। तो राजकुमारी बड़ी शुद्ध भक्त थीं मदन मोहन जी की। तो देखिए ऐसा जीवन होता है भले ही राजा हो या रंक। ये राजकुमारी भी जानती थी मैं तो राजमहल में रहने वाली हूँ परन्तु ये सोने चाँदी का धन क्या चीज है, कुछ भी नहीं है, मुझे सच्चा धन चाहिए, मुझे तो मदन मोहन जी चाहिए। ये हैँ ऊँचे विचार। तो राजमहल में रहते हुए भी वो कितना सरल जीवन जी रहे थे। मदन मोहन जी की सेवा में उसका जीवन कट गया। तो ऐसे हमारा जीवन होना चाहिए चाहे हम गरीब हों या अमीर हों भौतिक दृष्टि से। हमें भगवान श्रीकृष्ण की सेवा करनी चाहिए, भगवान को भी अपना धन समझना चाहिए, भगवान की भक्ति ही हमारा सर्वश्रेष्ठ धन है, ऐसे जान लेना चाहिए तब हमारा जीवन सार्थक हो जाएगा सफल हो जाएगा। किसी भी शहर में रहते समय समस्य़ा तो बहुत आऐंगीं, तरह तरह के प्रलोभन आते हैं जीवन में किन्तु हमें सावधान रहना चाहिए। जीवन को ज्यादा कठिन नहीं बनाना चाहिए, बिल्कुल कम से कम चीजों से गुजारा करने के लिए तैयारी करनी चाहिए। तब भगवान की प्राप्ति हमारे लिए आसान हो जाएगी।

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे,

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे

प्रश्नोत्तर-

प्र- जब हम दफ्तर जाते हैं तो वहाँ वातावरण भक्ति के प्रतिकूल होता है तो ऐसे में हमें क्या उनके जैसा बनना चाहिऐ?

- बनना नहीं चाहिए परन्तु आपकी नौकरी के लिए जितना आवश्यक है उनका उतना ही उपयोग करना चाहिए। जिन चीजों में वो रमण करते हैं उन चीजों में हमें रमण नहीं करना चाहिए। जैसे आपके दफ्तर में कम्प्यूटर का इसतेमाल कर रहे हों तो आप कीजिए यदि वह आपकी नौकरी के लिए आवश्यक है तो। परन्तु उनके साथ साथ जाकर यहाँ वहाँ सिनेमा न देखिए, होटलों में खाने के लिए मत जाईए। तो जो आवश्यक है वो कीजिए और अपने सिद्धांतों को बनाए रखिए।

प्र- यदि हम अपने घर में टीवी नहीं रखते है किन्तु बच्चे बाहर जाते हैं तो वहाँ वे टीवी देखते हैं, उस समस्या से कैसे बचा जाए?

- हाँ यह आधुनिक जीवन की एक समस्या है। आजकल सरकार सोचती है कि गाँव गाँव, घर घर में टीवी होना चाहिए, अहो बर्बादी! वो सोचते हैं यह प्रगति है। बेचारे गाँव वाले सरल जीवन जी रहे हैं किन्तु सरकार जानबूझ कर उनके मन में शहरी जीवन की चमक दमक के विचार डाल देती है। यह एस विकट समस्या है। एसा बताया जाता है कि एक बच्चे को बड़ा करने के लिए एक परिवार काफी नहीं है, सारे गाँव को मिलकर काम करना चाहिए। क्योंकि बच्चा तो हमेशा घर में रहता नहीं है, अपने मित्रों के साथ खेलता है, इधर उधर जाता है। इसलिए हमें चाहिए कि ऐसा एक माहौल बनाऐं जो भक्ति पर केंद्रित हो। भक्तों को आपस में मिलजुल कर रहना चाहिए। ऐसी व्यवस्था यदि सम्भव हो तो करना चाहिए। हो सकता है यह पूर्ण रूप से सम्भव न हो, किन्तु जितना सम्भव हो उतना प्रयास करना चाहिए। इसलिए प्रभुपाद जी चाहते थे कि हमारी संस्था के गुरुकुल हों जहाँ बच्चों को शिक्षा मिले इत्यादि। तो जितना सम्भव हो उतना प्रयास किया जाना चाहिए।

प्र-हम सभी लोग नित्य रूप से सत्संग करते हैं, मन्त्रोच्चार करते हैं, प्रवचन सुनते हैं, तो भी हम उतना परिवर्तन नहीँ देख पाते हैं, ऐसा क्यों?

- यह तो हम भी आपसे समझना चाहते हैं कि ऐसा क्यों नहीं हो रहा है। अपेक्षित बदलाव क्यों नहीं आ रहा है। दवाई भी ठीक है, डाक्टर (श्रील प्रभुपाद) भी सही हैं, किन्तु यदि मरीज दवाई डॉक्टर के कहे अनुसार दवाई न ले तो रोग ठीक होने में अधिक समय लेगा।

प्र- युक्त वैराग्य की सही समझ क्या है?

- संसार की चीजों का प्रयोग अपनी इंद्रिय तृप्ति के लिए न करके भगवान की सेवा के लिए करना यही युक्त वैराग्य है।

प्र- आपने यह बताया कि हमारे पास जो है हमें उसमें सन्तुष्ट रहना चाहिए। किन्तु हमें लगता है कि हमारे पास यह भी हो वह भी हो, तो इस बात की समझ कैसे विकसित हो कि हम क्या लें और क्या छोड़ें?

- जैसे जैसे आप भक्ति में आगे बढ़ेंगे वैसे वैसे आप इस बात की समझ विकसित करेंगे कि आपके लिए क्या आवश्यक है और क्या नहीं। और हम यह भी समझ पाऐंगे कि वास्तव में हमें उतनी आवश्यकता नहीं है जितना कि हम समझ रहे हैं। साथ साथ हमें प्रैक्टिकल भी रहना चाहिए। यदि हम सनातन गोस्वामी की नकल करने लगेंगे तो हम कर नहीं पाऐंगे। हमें अपनी आध्यात्मिक बुद्धि का प्रयोग करना चाहिए। इसके अलावा वरिष्ठ भक्तों से सलाह ले लेना चाहिए।

प्र- शुद्ध भक्त के लक्षण क्या हैं और हम शुद्ध भक्त बनने का प्रयास कैसे कर सकते हैं?

- केवल प्रभुपाद जी के बताए हुए आदेश का हमें पालन करना है। वही चीजें। वही पुरानी बातें। चार नियमों का पालन, हरे कृष्ण महामंत्र को हर रोज नियमित जप।

प्र- यदि हमने प्रतिदिन दो माला जपने का नियम बनाया है और किसी कारणवश वह हम उस दिन न कर पाऐं तो क्या करना चाहिए?

- पहले तो हमारा प्रयास यह रहना चाहिए कि माला का नियम भंग न हो, यदि किसी कारणवश छूट जाए तो अगले दिन उसको पूरा कर लेना चाहिए।

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